चूत और गांड की धोबी धुलाई 1

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//tssensor.ru हमारा परिवारिक काम धोबी (वाशमॅन) का है. हम लोग एक छोटे से गाँव में रहते हैं और Hindi Sex Stories Antarvasna Kamukta hindisexstories1 Sex Kahani Indian Sex Chudai वहां धोबी का एक ही घर है इसीलिए हम लोग को ही गाँव के सारे कपड़े साफ करने को मिलते थे. मेरे परिवार में मैं , माँ और पिताजी है. मेरी उमर इस समय 15 साल की हो गई थी और मेरा सोलहवां साल चलने लगा था. गाँव के स्कूल में ही पढ़ाई लिखाई चालू थी. हमारा एक छोटा सा खेत था जिस पर पिताजी काम करते थे. मैं और माँ ने कपड़े साफ़ करने का काम संभाल रखा था. कुल मिला कर हम बहुत सुखी सम्पन थे और किसी चीज़ की दिक्कत नही थी. हम दोनो माँ - बेटे हर सप्ताह में दो बार नदी पर जाते थे और सफाई करते थे फिर घर आकर उन कपड़ो की स्त्री कर के उन्हे वापस लौटा कर फिर से पुराने गंदे कपड़े एकत्र कर लेते थे. हर बुधवार और शनिवार को मैं सुबह 9 बजे के समय मैं और माँ एक छोटे से गधे पर पुराने कपड़े लाद कर नदी की ओर निकल पड़ते . हम गाँव के पास बहने वाली नदी में कपड़े ना धो कर गाँव से थोड़ी दूर जा कर सुनसान जगह पर कपड़े धोते थे क्योंकि गाँव के पास वाली नदी पर साफ पानी नही मिलता था और हमेशा भीड़ लगी रहती थी.

मेरी माँ 34-35 साल के उमर की एक बहुत सुंदर गोरी औरत है. ज़यादा लंबी तो नही परन्तु उसकी लंबाई 5 फुट 3 इंच की है और मेरी 5 फुट 7 इंच की है. सबसे आकर्षक उसके मोटे मोटे चुत्तर और नारियल के जैसी स्तन थे ऐसा लगते थे जैसे की ब्लाउज को फाड़ के निकल जाएँगे और भाले की तरह से नुकीले थे. उसके चूतर भी कम सेक्सी नही थे और जब वो चलती थी तो ऐसे मटकते थे कि देखने वाले के उसके हिलते गांड को देख कर हिल जाते थे. पर उस वक़्त मुझे इन बातो का कम ही ज्ञान था फिर भी तोरा बहुत तो गाँव के लड़को की साथ रहने के कारण पता चल ही गया था. और जब भी मैं और माँ कपड़े धोने जाते तो मैं बड़ी खुशी के साथ कपड़े धोने उसके साथ जाता था. जब मा कपड़े को नदी के किनारे धोने के लिए बैठती थी तब वो अपनी साड़ी और पेटिकोट को घुटनो तक उपर उठा लेती थी और फिर पीछे एक पत्थर पर बैठ कर आराम से दोनो टाँगे फैला कर जैसा की औरते पेशाब करने वक़्त करती है कपरो को साफ़ करती थी. मैं भी अपनी लूँगी को जाँघ तक उठा कर कपड़े साफ करता रहता था. इस स्थिति में मा की गोरी गोरी टाँगे मुझे देखने को मिल जाती थी और उसकी साड़ी भी सिमट कर उसके ब्लाउज के बीच में आ जाती थी और उसके मोटे मोटे चुचो के ब्लाउज के उपर से दर्शन होते रहते थे. कई बार उसकी साड़ी जाँघों के उपर तक उठ जाती थी और ऐसे समय में उसकी गोरी गोरी मोटी मोटी केले के तने जैसे चिकनी जाँघो को देख कर मेरा लंड खडा हो जाता था. मेरे मन में कई सवाल उठने लगते फिर मैं अपना सिर झटक कर काम करने लगता था. मैं और माँ कपड़ों की सफाई के साथ-साथ तरह-तरह की गाँव - घर की बाते भी करते जाते कई बार हम उस सुन-सन जगह पर ऐसा कुछ दिख जाता था जिसको देख के हम दोनो एक दूसरे से अपना मुँह छुपाने लगते थे.

कपड़े धोने के बाद हम वही पर नहाते थे और फिर साथ लाए हुआ खाना खा नदी के किनारे सुखाए हुए कपड़े को इकट्ठा कर के घर वापस लौट जाते थे. मैं तो खैर लूँगी पहन कर नदी के अंदर कमर तक पानी में नहाता था, मगर माँ नदी के किनारे ही बैठ कर नहाती थी. नहाने के लिए माँ सबसे पहले अपनी साड़ी उतारती थी. फिर अपने पेटिकोट के नाड़े को खोल कर पेटिकोट उपर को सरका कर अपने दाँत से पकड़ लेती थी इस तरीके से उसकी पीठ तो दिखती थी मगर आगे से ब्लाउज पूरा ढक जाता था फिर वो पेटिकोट को दाँत से पकडे हुए ही अंदर हाथ डाल कर अपने ब्लाउज को खोल कर उतरती थी. और फिर पेटीकोट को छाती के उपर बाँध देती थी जिस से उसके चुचे पूरी तरह से पेटीकोट से ढक जाते थे और कुछ भी नज़र नही आता था और घुटनो तक पूरा बदन ढक जाता था. फिर वो वही पर नदी के किनारे बैठ कर एक बड़े से जग से पानी भर भर के पहले अपने पूरे बदन को रगड़ - रगड़ कर सॉफ करती थी और साबुन लगाती थी फिर नदी में उतर कर नहाती थी. माँ की देखा देखी मैने भी पहले नदी के किनारे बैठ कर अपने बदन को साफ करना शुरू कर दिया. फिर मैं नदी में डुबकी लगा के नहाने लगा. मैं जब साबुन लगाता तो मैं अपने हाथो को अपने लूँगी के घुसा के पूरे लंड आंड गांद पर चारो तरफ घुमा घुमा के साबुन लगा के सफाई करता था क्यों मैं भी माँ की तरह बहुत सफाई पसंद था. जब मैं ऐसा कर रहा होता तो मैने कई बार देखा की मा बड़े गौर से मुझे देखती रहती थी और अपने पैर की एडियाँ पत्थर पर धीरे धीरे रगड़ के सॉफ करती होती. मैं सोचता था वो शायद इसलिए देखती है की मैं ठीक से सफाई करता हू या नही. इसलिए मैं भी बारे आराम से खूब दिखा दिखा के साबुन लगता था की कही डांट ना सुनने को मिल जाए कि ठीक से सॉफ सफाई का ध्यान नही रखता हू . मैं अपने लूँगी के भीतर पूरा हाथ डाल के अपने लंड को अच्छे तरीके से साफ करता था इस काम में मैने नोटीस किया कि कई बार मेरी लूँगी भी इधर उधर हो जाती थी जिससे मा को मेरे लंड की एक आध झलक भी दिख जाती थी. जब पहली बार ऐसा हुआ तो मुझे लगा की शायद मा डाटेंगी मगर ऐसा कुछ नही हुआ. तब निश्चिंत हो गया और मज़े से अपना पूरा ध्यान सॉफ सफाई पर लगाने लगा.

माँ की सुंदरता देख कर मेरा भी मन कई बार ललचा जाता था और मैं भी चाहता था की मैं उसे साफाई करते हुए देखु पर वो ज्यादा कुछ देखने नही देती थी और घुटनो तक की सफाई करती थी और फिर बड़ी सावधानी से अपने हाथो को अपने पेटीकोट के अंदर ले जा कर अपनी चूत की सफाई करती जैसे ही मैं उसकी ओर देखता तो वो अपना हाथ पेटीकोट में से निकल कर अपने हाथो की सफाई में जुट जाती थी. इसीलिए मैं कुछ नही देख पता था और चुकी वो घुटनो को मोड़ के अपने छाती से सताए हुए होती थी इसीलये पेटिकोट के उपर से छाती की झलक मिलनी चाहिए वो भी नही मिल पाती थी. इसी तरह जब वो अपने पेटिकोट के अंदर हाथ घुसा कर अपने जाँघों और उसके बीच की सफाई करती थी ये ध्यान रखती की मैं उसे देख रहा हू या नही. जैसे ही मैं उसकी ओर घूमता वो झट से अपना हाथ निकाल लेती थी और अपने बदन पर पानी डालने लगती थी. मैं मन मसोस के रह जाता था.

एक दिन सफाई करते करते मा का ध्यान शायद मेरी तरफ से हट गया था और बरे आराम से अपने पेटिकोट को अपने जाँघों तक उठा के सफाई कर रही थी. उसकी गोरी चिकनी जाँघों को देख कर मेरा लंड खड़ा होने लगा और मैं जो की इस वक़्त अपनी लूँगी को ढीला कर के अपने हाथो को लूँगी के अंदर डाल कर अपने लंड की सफाई कर रहा था धीरे धीरे अपने लंड को मसल्ने लगा. तभी अचानक मा की नज़र मेरे उपर गई और उसने अपना हाथ निकल लिया और अपने बदन पर पानी डालती हुई बोली "क्या कर रहा है जल्दी से नहा के काम ख़तम कर" मेरे तो होश ही उर गये और मैं जल्दी से नदी में जाने के लिए उठ कर खड़ा हो गया, पर मुझे इस बात का तो ध्यान ही नही रहा की मेरी लूँगी तो खुली हुई है और मेरी लूँगी सरसारते हुए नीचे गिर गई. मेरा पूरा बदन नंगा हो गया और मेरा 8.5 इंच का लंड जो की पूरी तरह से खड़ा था धूप की रोशनी में नज़र आने लगा. मैने देखा की मा एक पल के लिए चकित हो कर मेरे पूरे बदन और नंगे लंड की ओर देखती रह गई मैने जल्दी से अपनी लूँगी उठाई और चुपचाप पानी में घुस गया. मुझे बड़ा डर लग रहा था की अब क्या होगा अब तो पक्की डाँट पड़ेगी और मैने कनखियो से मा की ओर देखा तो पाया की वो अपने सिर को नीचे किया हल्के हल्के मुस्कुरा रही है और अपने पैरो पर अपने हाथ चला के सफाई कर रही है. मैं ने राहत की सांस ली. और चुपचाप नहाने लगा. उस दिन हम जायदातर चुप चाप ही रहे. घर वापस लौटते वक़्त भी मा ज़यादा नही बोली.
दूसरे दिन से मैने देखा की मा मेरे साथ कुछ ज्यादा ही खुल कर हँसी मज़ाक करती रहती थी और हमारे बीच डबल मीनिंग में भी बाते होने लगी थी. पता नही मा को पता था या नही पर मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था. मैने जब भी किसी के घर से कपडे ले कर वापस लौटता तो

माँ बोलती "क्यों राधिया के कपडे भी लाया है धोने के लिए क्या"?.

तो मैं बोलता, `हा',

इसपर वो बोलती "ठीक है तू धोना उसके कपडे बड़ा गंदा करती है. उसकी सलवार तो मुझसे धोई नही जाती". फिर पूछती थी "अंदर के कपडे भी धोने के लिए दिए है क्या"? अंदर के कपरो से उसका मतलब पेंटी और ब्रा या फिर अंगिया से होता था,

मैं कहता नही तो इस पर हसने लगती और कहती "तू लड़का है ना शायद इसीलिए तुझे नही दिया होगा, देख अगली बार जब मैं माँगने जाऊंगी तो ज़रूर देगी" फिर अगली बार जब वो कपडे लाने जाती तो सचमुच में वो उसकी पेंटी और अंगिया ले के आती थी और बोलती "देख मैं ना कहती थी की वो तुझे नही देगी और मुझे दे देगी, तू लड़का है ना, तेरे को देने में शरमाती होंगी, फिर तू तो अब जवान भी हो गया है" मैं अंजान बना पुछ्ता क्या देने में शरमाती है राधिया तो मुझे उसकी पेंटी और ब्रा या अंगिया फैला कर दिखती और मुस्कुराते हुए बोलती "ले खुद ही देख ले" इस पर मैं शर्मा जाता और कनखियों से देख कर मुँह घुमा लेता तो वो बोलती "अर्रे शरमाता क्यों है, ये भी तेरे को ही धोना परेगा" कह के हसने लगती. पता नही क्यों मा अब कुछ दिनों से इस तरह की बातो में ज़यादा इंटेरेस्ट लेने लगी थी. मैं भी चुप- चाप उसकी बाते सुनता रहता और मज़े से जवाब देता रहता था.जब हम नदी पर कपडे धोने जाते तब भी मैं देखता था की माँ अब पहले से थोरी ज्यादा खुले तौर पर पेश आती थी. पहले वो मेरी तरफ पीठ करके अपने ब्लाउज को खोलती थी और पेटिकोट को अपनी छाती पर बाँधने के बाद ही मेरी तरफ घूमती थी, पर अब वो इस पर ध्यान नही देती और मेरी तरफ घूम कर अपने ब्लाउज को खोलती और मेरे ही सामने बैठ कर मेरे साथ ही नहाने लगती, जब की पहले वो मेरे नहाने तक इंतेज़ार करती थी और जब मैं थोडा दूर जा के बैठ जाता तब पूरा नहाती थी. मेरे नहाते वक़्त उसका मुझे घुरना बदस्तूर जारी था और मेरे में भी हिम्मत आ गई थी और मैं भी जब वो अपने छातियों की सफाई कर रही होती तो उसे घूर कर देखता रहता. माँ भी मज़े से अपने पेटिकोट को जाँघों तक उठा कर एक पत्थर पर बैठ जाती और साबुन लगाती और ऐसे एक्टिंग करती जैसे मुझे देख ही नही रही है. उसके दोनो घुटने मुड़े हुए होते थे और एक पैर थोडा पहले आगे पसारती और उस पर पूरा जाँघो तक साबुन लगाती थी फिर पहले पैर को मोड़ कर दूसरे पैर को फैला कर साबुन लगाती. पूरा अंदर तक साबुन लगाने के लिए वो अपने घुटने मोड़े रखती और अपने बाए हाथ से अपने पेटिकोट को थोडा उठा के या अलग कर के दाहिने हाथ को अंदर डाल के साबुन लगाती. मैं चूँकि थोड़ी दूर पर उसके बगल में बैठा होता इसीलिए मुझे पेटिकोट के अन्दर का नज़ारा तो नही मिलता था, जिसके कारण से मैं मन मसोस के रह जाता था की काश मैं सामने होता, पर इतने में ही मुझे ग़ज़ब का मज़ा आ जाता था. और उसकी नंगी चिकनी चिकनी जंघे उपर तक दिख जाती थी. माँ अपने हाथ से साबुन लगाने के बाद बड़े मग को उठा के उसका पानी सीधे अपने पेटिकोट के अंदर डाल देती और दूसरे हाथ से साथ ही साथ रगडती भी रहती थी. ये इतना जबरदस्त सीन होता था की मेरा तो लंड खड़ा हो के फुफ्करने लगता और मैं वही नहाते नहाते अपने लंड को मसल्ने लगता. जब मेरे से बर्दस्त नही होता तो मैं सीधा नदी में कमर तक पानी में उतर जाता और पानी के अंदर हाथ से अपने लंड को पाकर कर खड़ा हो जाता और मा की तरफ घूम जाता. जब वो मुझे पानी में इस तरह से उसकी तरफ घूम कर नहाते देखती तो वो मुस्कुरा के मेरी तरफ देखती हुई बोलती " ज्यादा दूर मत जाना , किनारे पर ही नहा ले, आगे पानी बहुत गहरा है", मैं कुछ नही बोलता और अपने हाथो से अपने लंड को मसालते हुए नहाने की एक्टिंग करता रहता. इधर मा मेरी तरफ देखती हुई अपने हाथो को उपर उठा उठा के अपने कांख की सफाई करती कभी अपने हाथो को अपने पेटिकोट में घुसा के छाती को साफ करती कभी जाँघों के बीच हाथ घुसा के खूब तेज़ी से हाथ चलने लगती, दूर से कोई देखे तो ऐसा लगेगा के मूठ मार रही है और शायद मारती भी होगी. कभी कभी वो भी खड़े हो नदी में उतर जाती और ऐसे में उसका पेटिकोट जो की उसके बदन चिपका हुआ होता था गीला होने के कारण मेरी हालत और ज्यादा खराब कर देता था. पेटिकोट चिपकने के कारण उसकी बड़ी बड़ी चुचिया नुमाया हो जाती थी. कपडे के उपर से उसके बड़े बड़े मोटे मोटे निपल तक दिखने लगते थे. पेटिकोट उसके चूतडों से चिपक कर उसके गांड के दरार में फंसा हुआ होता था और उसके बड़े बड़े चूतर साफ साफ दिखाई देते रहते थे. वो भी कमर तक पानी में मेरे ठीक सामने आ के खडी हो के डुबकी लगाने लगती और मुझे अपने चुचियों का नज़ारा करवाती जाती. मैं तो वही नदी में ही लंड मसल के मूठ मार लेता था. हालांकि मूठ मारना मेरी आदत नही थी . घर पर मैं ये काम कभी नही करता था पर जब से मा के स्वाभाव में चेंज आया था नदी पर मेरी हालत ऐसे हो जाती थी की मैं मज़बूर हो जाता था. अब तो घर पर मैं जब भी स्त्री करने बैठता तो मुझे बोलती जाती "देख ध्यान से स्त्री करियो . पिछली बार शयामा बोल रही थी की उसके ब्लाउज ठीक से स्त्री नही थे"

मैं भी बोल पड़ता "ठीक है. कर दूँगा, इतना छोटा सा ब्लाउज तो पहनती है, ढंग से स्त्री भी नही हो पाती. , पता नही कैसे काम चलती है इतने छोटे से ब्लाउज में" तो माँ बोलती "अरे उसकी चूचियां ज़यादा बड़ी थोड़े ही है जो वो बड़ा ब्लाउज पहनेगी, हाँ उसकी सास के ब्लाउज बहुत बड़े बड़े है बुधिया की चूची पहाड़ जैसी है. " कह कर माँ हंसने लगती. फिर मेरे से बोलती"तू सबके ब्लाउज की लंबाई चौड़ाई देखता रहता है क्या या फिर स्त्री करता है".

मैं क्या बोलता चुपचाप सिर झुका कर स्त्री करते हुए धीरे से बोलता "अर्रे देखता कौन है, नज़र चली जाती है, बस". स्त्री करते करते मेरा पूरा बदन पसीने से नहा जाता था. मैं केवल लूँगी पहने स्त्री कर रहा होता था. माँ मुझे पसीने से नहाए हुए देख कर बोलती "छोड़ , अब तू कुछ आराम कर ले. तब तक मैं स्त्री करती हू," मा ये काम करने लगती. थोरी ही देर में उसके माथे से भी पसीना चुने लगता और वो अपनी साडी खोल कर एक ओर फेक देती और बोलती "बरी गर्मी है रे, पता नही तू कैसे कर लेता है इतने कपरो की स्त्री मेरे से तो ये गर्मी बर्दस्त नही होती" इस पर मैं वही पास बैठा उसके नंगे पेट, गहरी नाभि और मोटे चुचो को देखता हुआ बोलता, "ठंडा कर दू तुझे"?

"कैसे करेगा ठंडा"? "

डंडे वाले पंखे से मैं तुझे पंखा झल देता हू", फैन चलाने पर तो स्त्री ही ठंडी पर जाएगी".

रहने दे तेरे डंडे वाले पँखे से भी कुछ नही होने जाने का, छोटा सा तो पंखा है तेरा". कह कर अपने हाथ उपर उठा कर माथे पर छलक आए पसीने को पोछती तो मैं देखता की उसकी कांख पसीने से पूरी भीग गई है. और उसके गर्देन से बहता हुआ पसीना उसके ब्लाउज के अंदर उसके दोनो चुचियों के बीच की घाटी मे जा कर उसके ब्लाउज को भींगा रहा होता. घर के अंदर वैसे भी वो ब्रा तो कभी पहनती नही थी इस कारण से उसके पतले ब्लाउज को पसीना पूरी तरह से भीगा देता था और, उसकी चुचिया उसके ब्लाउज के उपर से नज़र आती थी. कई बार जब वो हल्के रंगा का ब्लाउज पहनी होती तो उसके मोटे मोटे भूरे रंग के निपल नज़र आने लगते. ये देख कर मेरा लंड खडा होने लगता था. कभी कभी वो स्त्री को एक तरफ रख के अपने पेटिकोट को उठा के पसीना पोछने के लिए अपने सिर तक ले जाती और मैं ऐसे ही मौके के इंतेज़ार में बैठा रहता था, क्योंकि इस वक़्त उसकी आँखे तो पेटिकोट से ढक जाती थी पर पेटिकोट उपर उठने के कारण उसका टाँगे पूरा जांघ तक नंगी हो जाती थी और मैं बिना अपनी नज़रो को चुराए उसके गोरी चिटी मखमली जाँघों को तो जी भर के देखता था. माँ अपने चेहरे का पसीना अपनी आँखे बंद कर के पूरे आराम से पोछती थी और मुझे उसके मोटे कंडली के खम्भे जैसे जांघों को पूरा नज़ारा दिखाती थी. रात में जब खाना खाने का टाइम आता तो मैं नहा धो कर किचन में आ जाता, खाना खाने के लिए. मा भी वही बैठा के मुझे गरम गरम रोटिया सेक देती जाती और हम खाते रहते. इस समय भी वो पेटिकोट और ब्लाउज में ही होती थी . क्यों की किचन में गर्मी होती थी और उसने एक छोटा सा पल्लू अपने कंधो पर डाल रखा होता. उसी से अपने माथे का पसीना पोछती रहती और खाना खिलती जाती थी मुझे. हम दोनो साथ में बाते भी कर रहे होते.

मैने मज़ाक करते हुए बोलता " सच में मा तुम तो गरम स्त्री (वुमन) हो". वो पहले तो कुछ साँझ नही पाती फिर जब उसकी समझ में आता की मैं आइरन स्त्री ना कह के उसे स्त्री कह रहा हू तो वो हसने लगती और कहती "हा मैं गरम इस्त्री हू", और अपना चेहरा आगे करके बोलती "देख कितना पसीना आ रहा है, मेरी गर्मी दूर कर दे" "

मैं तुझे एक बात बोलू तू गरम चीज़े मत खाया कर, ठंडी चीज़ खाया कर"

"अच्छा , कौन से ठंडी चीज़ मैं खाऊं कि मेरी गर्मी दूर हो जाएगी"

"केले और बैगन की सब्जिया खाया कर"

इस पर मा का चेहरा लाल हो जाता था और वो सिर झुका लेती और

धीरे से बोलती " अर्रे केले और बैगान की सब्जी तो मुझे भी अच्छी लगती है पर कोई लाने वाला भी तो हो, तेरा बापू तो ये सब्जिया लाने से रहा, ना तो उसे केला पसंद है ना ही उसे बैगन".

"तू फिकर मत कर . मैं ला दूँगा तेरे लिए"

"अच्छा बेटा है तू, मा का कितना ध्यान रखता है"

मैं खाना ख़तम करते हुए बोलता, "चल अब खाना तो हो गया ख़तम, तू भी जा के नहा ले और खाना खा ले", "अर्रे नही अभी तो तेरा बापू देसी चढ़ा के आता होगा, उसको खिला दूँगी तब खूँगी, तब तक नहा लेती हू" तू जा और जा के सो जा, कल नदी पर भी जाना है". मुझे भी ध्यान आ गया की हाँ कल तो नदी पर भी जाना है मैं छत पर चला गया. गर्मियों में हम तीनो लोग छत पर ही सोया करते थे.

सुबह सूरज की पहली किरण के साथ जब मेरी नींद खुली तो देखा एक तरफ बापू अभी भी लुढ़का हुआ है और माँ शायद पहले ही उठ कर जा चुकी थी . मैं भी जल्दी से नीचे पहुचा तो देखा की माँ बाथरूम से आ के हॅंडपंप पर अपने हाथ पैर धो रही थी. मुझे देखते ही बोली "चल जल्दी से तैयार हो जा मैं खाना बना लेती हू फिर जल्दी से नदी पर निकाल जाएँगे, तेरे बापू को भी आज शहर जाना है बीज लाने, मैं उसको भी उठा देती हू". थोरी देर में जब मैं वापस आया तो देखा की बापू भी उठ चुका था और वो बाथरूम जाने की तैयारी में था. मैं भी अपने काम में लग गया और सारे कपड़ों के गट्ठर बना के तैयार कर दिया. थोरी देर में हम सब लोग तैयार हो गये. घर को ताला लगाने के बाद बापू बस पकड़ने के लिए चल दिया और हम दोनो नदी की ओर. मैने मा से पुछा की बापू कब तक आएँगे तो वो बोली "क्या पता कब आएगा मुझे तो बोला है की कल आ जाउंगा पर कोई भरोसा है तेरे बापू का, चार दिन भी लगा देगा, ".

हम लोग नदी पर पहुच गये और फिर अपने काम में लग गये, कपड़ों की सफाई के बाद मैने उन्हें एक तरफ सूखने के लिए डाल दिया और फिर हम दोनो ने नहाने की तैयारी शुरू कर दी. माँ ने भी अपनी साड़ी उतार के पहले उसको साफ किया फिर हर बार की तरह अपने पेटिकोट को उपर चढ़ा के अपनी ब्लाउज निकाली फिर उसको साफ किया और फिर अपने बदन को रगड़ रगड़ के नहाने लगी. मैं भी बगल में बैठा उसको निहारते हुए नहाता रहा बेखयाली में एक दो बार तो मेरी लूँगी भी मेरे बदन पर से हट गई थी पर अब तो ये बहुत बार हो चुका था. इसलिए मैने इस पर कोई ध्यान नही दिया, हर बार की तरह मा ने भी अपने हाथो को पेटिकोट के अंदर डाल के खूब रगड़ रगड़ के नहाना चालू रखा. थोरी देर बाद मैं नदी में उतर गया. माँ ने भी नदी में उतर के एक दो डुबकिया लगाई और फिर हम दोनो बाहर आ गये. मैने अपने कपडे चेंज कर लिए और पाजामा और कुर्ता पहन लिया. माँ ने भी पहले अपने बदन को टॉवेल से सूखाया फिर अपने पेटिकोट के डोर को जिसको की वो छाती पर बाँध के रखती थी उपर से खोल लिया और अपने दांतों से पेटिकोट को पकड़ लिया, ये उसका हमेशा का काम था, मैं उसको पत्थर पर बैठ के एक तक देखे जा रहा था. इस प्रकार उसके दोनो हाथ फ्री हो गये थे अब उसने ब्लाउज को पहन ने के लिए पहले उसने अपना बाया हाथ उसमे घुसाया फिर जैसे ही वो अपना दाहिना हाथ ब्लाउज में घुसाने जा रही थी की पता नही क्या हुआ उसके दांतों से उसकी पेटिकोट छुट गई. और सीधे सरसरते हुए नीचे गिर गई. और उसका पूरा का पूरा नंगा बदन एक पल के लिए मेरी आँखो के सामने दिखने लगा. उसके बड़ी बड़ी चुचिया जिन्हे मैने अब तक कपड़ों के उपर से ही देखा था और उसके भारी बाहरी चूतर और उसकी मोटी मोटी जांघे और झाट के बाल सब एक पल के लिए मेरी आँखो के सामने नंगे हो गये. पेटिकोट के नीचे गिरते ही उसके साथ ही माँ भी तेज़ी के साथ नीचे बैठ गई. मैं आँखे फाड़ फाड़ फर के देखते हुए वही पर खड़ा रह गया. मा नीचे बैठ कर अपने पेटिकोट को फिर से समेटती हुई बोली " ध्यान ही नही रहा मैं तुझे कुछ बोलना चाहती थी और ये पेटिकोट दांतों से छुट गया" .

मैं कुछ नही बोला. मा फिर से खडी हो गई और अपने ब्लाउज को पहनने लगी. फिर उसने अपने पेटिकोट को नीचे किया और बाँध लिया. फिर साड़ी पहन कर वो वही बैठ के अपने भीगे पेटिकोट को साफ कर के तैयार हो गई. फिर हम दोनो खाना खाने लगे. खाना खाने के बाद हम वही पेड़ की छावं में बैठ कर आराम करने लगे. जगह सुनसान थी . ठंडी हवा बह रही थी. मैं पेड़ के नीचे लेटे हुए माँ की तरफ घुमा तो वो भी मेरी तरफ घूमी. इस वक़्त उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कराहट पसरी हुई थी.

मैने पुछा "माँ क्यों हंस रही हो",

तो वो बोली "क्या करू, अब हसने पर भी कोई रोक है क्या"?

"नही मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था, नही बताना है तो मत बताओ"

मा बोली - "अर्रे इतनी अच्छी ठंडी हवा बह रही है चेहरे पर तो मुस्कान आएगी ही . यहा पेड़ की छावं में कितना अच्छा लग रहा है, ठंडी ठंडी हवा चल रही है, और आज तो मैने पूरा हवा खाया है"

"पूरा हवा खाया है, वो कैसे"

"मैं पूरी नंगी जो हो गई थी, फिर बोली ही, तुझे मुझे ऐसे नही देखना चाहिए था,

"क्यों नही देखना चाहिए था"

"अर्रे बेवकूफ़, इतना भी नही समझता एक मा को उसके बेटे के सामने नंगा नही होना चाहिए था"

"कहा नंगी हुई थी तुम बस एक सेकेंड के लिए तो तुम्हारा पेटिकोट नीचे गिर गया था" (हालाँकि वही एक सेकेंड मुझे एक घंटे के बराबर लग रहा था).

"हा फिर भी मुझे नंगा नही होना चाहिए था, कोई जानेगा तो क्या कहेगा की मैं अपने बेटे के सामने नंगी हो गयी थी ".

"कौन जानेगा, यहा पर तो कोई था भी नही तू बेकार में क्यों परेशान हो रही है"

"अर्रे नही फिर भी कोई जान गया तो", फिर कुछ सोचती हुई बोली, अगर कोई नही जानेगा तो क्या तू मुझे नंगा देखेगा क्या", मैं और मा दोनो एक दूसरे के आमने सामने एक सूखे चादर पर सुन-सान जगह पर पेड़ के नीचे एक दूसरे की ओर मुँह कर के लेते हुए थे और माँ की साड़ी उसके छाति पर से लुढ़क गई थी. माँ के मुँह से ये बात सुन के मैं खामोश रह गया और मेरी साँसे तेज चलने लगी. माँ ने मेरी ओर देखते हुए पुछा "क्या हुआ, "

मैने कोई जवाब नही दिया और हल्के से मुस्कुराते हुए उसकी छातियो की तरफ देखने लगा जो उसकी तेज चलती सांसो के साथ उपर नीचे हो रहे थे. वो मेरी तरफ देखते हुए बोली "क्या हुआ मेरी बात का जवाब दे ना, अगर कोई जानेगा नही तो क्या तू मुझे नंगा देख लेगा"?

इस पर मेरे मुँह से कुछ नही निकला और मैने अपना सिर नीचे कर लिया, मा ने मेरी ठोड़ी पकड़ के उपर उठाते हुए मेरे आँखो में झाँकते हुए पुछा , "क्या हुआ रे,? बोल ना क्या तू मुझे नंगा देख, लेगा जैसे तूने आज देखा है,"

मैने कहा " मा, मैं क्या बोलू" मेरा तो गॅला सुख रहा था,.

मा ने मेरे हाथ को अपने हाथो में ले लिया और कहा "इसका मतलब तू मुझे नंगा नही देख सकता, है ना".

मेरे मुँह से निकाल गया- " मा, छोरो ना," मैं हकलाते हुए बोला "नही मा ऐसा नही है".

"तो फिर क्या है, तू अपनी मा को नंगा देख लेगा क्या"

मैं क्या कर सकता था, वो तो तुम्हारा पेटिकोट नीचे गिर गया

तभी मुझे नंगा दिख गया नही तो मैं कैसे देख पाता,"

"वो तो मैं समझ गई, पर उस वक़्त तुझे देख के मुझे ऐसा लगा जैसे की तू मुझे घूर रहा है.......इसिलिये पुछा"

" मा ऐसा नही है, मैने तुम्हे बताया ना, तुम्हे बस ऐसा लगा होगा, "

"इसका मतलब तुझे अच्छा नही लगा था ना"

" मा छोरो ", मैं हाथ छुडाते हुए अपने चेहरे को छूपाते हुए बोला"

मा ने मेरा हाथ नही छोड़ा और बोली "सच सच बोल शरमाता क्यों है"

मेरे मुँह से निकाल गया "हा अच्छा लगा था",

इस पर मा ने मेरे हाथ को पकड़ के सीधे अपनी छाती पर रख दिया, और बोली "फिर से देखेगा मा को नंगा, बोल देखेगा?"

मेरी मुँह से आवाज़ नही निकाल पा रहा था मैने बड़ी मुश्किल से अपने अपने हाथो को उसके नुकीले गुदज छातियों पर स्थिर रख पा रहा था. ऐसे में मैं भला क्या जवाब देता? मेरे मुँह से एक क्रहने की सी आवाज़ निकली. माँ ने मेरी ठोडी पकड़ कर फिर से मेरे मुँह को उपर उठाया और बोली "क्या हुआ बोल ना शरमाता
क्यों है, जो बोलना है बोल" .

मैं कुछ ना बोला .

ठोड़ी देर तक उसके चुचियों पर ब्लाउज के उपर से ही हल्का सा मैने हाथ फेरा. फिर मैने हाथ खीच लिया. माँ कुछ नही बोली गौर से मुझे देखती रही फिर पता ना क्या सोच कर वो बोली "ठीक मैं सोती हू यही पर बरी अच्छी हवा चल रही है, तू कपड़ों को देखते रहना और जो सुख जाए उन्हे उठा लेना, ठीक है" और फिर मुँह घुमा कर एक तरफ सो गई. मैं भी चुप चाप वही आँख खोले लेटा रहा. माँ की चुचियाँ धीरे धीरे उपर नीचे हो रही थी. उसने अपना एक हाथ मोड़ कर अपने आँखो पर रखा हुआ था और दूसरा हाथ अपने बगल में रख कर सो रही थी. मैं चुपचाप उसे सोता हुआ देखता रहा, ठोड़ी देर में उसकी उठती गिरती चुचियों का जादू मेरे उपर चल गया और मेरा लंड खडा होने लगा. मेरा दिल कर रहा था की काश मैं फिर से उन चुचियों को एक बार छू लू. मैने अपने आप को गालिया भी निकाली, क्या उल्लू का पट्ठा हूँ . मैं भी जो चीज़ आराम से छुने को मिल रही थी तो उसे छूने की बजाए मैं हाथ हटा लिया. पर अब क्या हो सकता था. मैं चुप चाप वैसे ही बैठा रहा. कुछ सोच भी नही पा रहा था. फिर मैने सोचा की जब उस वक़्त मा ने खुद मेरा हाथ अपनी चुचियों पर रखा दिया था तो फिर अगर मैं खुद अपने मन से रखू तो शायद डाटेंगी नही, और फिर अगर डाटेंगी तो बोल दूँगा तुम्ही ने तो मेरा हाथ उस वक़्त पाकर कर रखा था, तो अब मैं अपने आप से रख दिया. सोचा शायद तुम बुरा नही मनोगी. यही सब सोच कर मैने अपने हाथो को धीरे से उसकी चुचियों पर ले जा के रख दिया, और हल्के हल्के सहलाने लगा. मुझे ग़ज़ब का मज़ा आ रहा था मैने हल्के से उसकी साड़ी को पूरी तरह से उसके ब्लाउज पर से हटा दिया और फिर उसकी चुचियों को दबाया. वाह ! इतना ग़ज़ब का मज़ा आया की बता नही सकता, एकदम गुदाज़ और सख़्त चुचियाँ थी मा की इस उमर में भी मेरा तो लंड खड़ा हो गया, और मैने अपने एक हाथ को चुचियों पर रखे हुए दूसरे हाथ से अपने लंड को मसल्ने लगा. जैसे जैसे मेरी बेताबी बढ़ रही थी वैसे वैसी मेरे हाथ दोनो जगहो पर तेज़ी के साथ चल रहे थे. मुझे लगता है की मैने मा की चुचियों को कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से दबा दिया था, शायद इसीलिए मा की आँख खुल गई. और वो एकदम से हडबडाते हुए उठ गई और अपने आँचल को संभालते हुए अपनी चुचियों को ढक लिया और फिर, मेरी तरफ देखती हुई बोली, "हाय, क्या कर रहा था तू, हाय मेरी तो आँख लग गई थी?"

मेरा एक हाथ अभी भी मेरे लंड पर था, और मेरे चेहरे का रंग उड़ गया था. मा ने मुझे गौर से एक पल के लिए देखा और सारा माजरा समझ गई और फिर अपने चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट बिखेरते हुए बोली "हाय, देखो तो सही क्या सही काम कर रहा था ये? लड़का , मेरा भी मसल रहा था और उधर अपना भी मसल रहा था".

वो अब एक दम से मेरे नज़दीक आ गई थी और उसकी गरम साँसे मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थी. वो एक पल के लिए ऐसे ही मुझे देखती रही फिर मेरे ठोडी पकड़ कर मुझे उपर उठाते हुए हल्के से मुस्कुराते हुए धीरे से बोली "क्यों रे बदमाश क्या कर रहा था, बोल ना क्या कर रहा था अपनी मा के साथ" फिर मेरे फूले फूले गाल पाकर कर हल्के से मसल दिया. मेरे मुँह से तो आवाज़ नही निकाल रही थी, फिर उसने हल्के से अपना एक हाथ मेरे जाँघो पर रखा और मेरे लंड को सहलाते हुए बोली "है, कैसे खड़ा कर रखा है मुए ने" फिर सीधा पाजामा के उपर से मेरे खड़े लंड जो की मा के जागने से थोडा ढीला हो गया था पर अब उसके हाथो स्पर्श पा के फिर से खड़ा होने लगा था पर उसने अपने हाथ रख दिया, "उई मा, कैसे खड़ा कर रखा है, क्या कर रहा था रे, हाथ से मसल रहा था क्या, है, बेटा और मेरी इसको भी मसल रहा था, तू तो अब लगता है जवान हो गया है, तभी मैं कहूँ की जैसे ही मेरा पेटिकोट नीचे गिरा ये लड़का मुझे घूर घूर के क्यों देख रहा था, ही, इस लड़के की तो अपनी मा के उपर ही बुरी नज़र है". अगर मैं नही जागती तो, तू तो अपना पानी निकाल के ही मानता ना, मेरे छातियों को दबा दबा के, उम्म्म. बोल, निकालता की ऩही पानी?"

" मा ग़लती हो गई,

"वाह रे तेरी ग़लती, कमाल की ग़लती है, किसी का मसल दो दबा दो फिर बोलो की ग़लती हो गई, अपना मज़ा कर लो दूसरे चाहे कैसे भी रहे",

कह कर मा ने मेरे लंड को कस के दबाया, उसके कोमल हाथो का स्पार्स पा के मेरा लंड तो लोहा हो गया था, और गरम भी काफ़ी हो गया था.

"हाय मा, छोडो , क्या कर रही हो"

मा उसी तरह से मुस्कुराती हुई बोली "क्यों प्यारे तूने मेरा दबाया तब तो मैने नही बोला की छोडो , अब क्यों बोल रहा है तू,"

मैने कहा ", मा तू दबाएगी तो सच में मेरा पानी निकाल जाएगा,

"क्यों पानी निकालने के लिए ही तो तू दबा रहा था ना मेरी छातिया, मैं अपने हाथ से निकाल देती हू, तेरे गन्ने से तेरा रूस, चल, ज़रा अपना गन्ना तो दिखा,"

" मा छोडो , मुझे शरम आती है"

"अच्छा , अभी तो बड़ी शरम आ रही है, और हर रोज जो लूँगी और पाजामा हटा हटा के, सफाई जब करता है तब, तब क्या मुझे दिखाई नही देता क्या, अभी बड़ी एक्टिंग कर रहा है,"

" नही मा, तब की बात तो और है, फिर मुझे थोड़े ही पता होता था की तुम देख रही हो",

"ओह ओह मेरे भोले राजा, बरा भोला बन रहा, चल दिखा ना, देखु कितना बड़ा और मोटा है तेरा गन्ना"

मैं कुछ बोल नही पा रहा था, मेरे मुँह से शब्द नही निकाल पा रहे थे, और लग रहा था जैसे, मेरा पानी अब निकला की तब निकला. इस बीच मा ने मेरे पाजामे का नारा खोल दिया और अंदर हाथ डाल के मेरे लंड को सीधा पकड़ लिए, मेरा लंड जो की केवल उसके छुने के कारण से फुफ्करने लगा था अब उसके पकड़ने पर अपनी पूरी औकात पर आ गया और किसी मोटे लोहे के रोड की तरह एक दम टन कर उपर की तरफ मुँह उठाए खड़ा था. मा ने मेरे लंड को अपने हाथो में पकड़ने पूर कोशिश कर रही थी पर, मेरे लंड की मोटाई के कारण से वो उसे अपने मुट्ठी में अच्छी तरह से क़ैद नही कर पा रही थी. उसने मेरे पाजामे को वही खुले में पेड़ के नीचे मेरे लंड पर से हटा दिया,

" मा, छोडो , कोई देख लेगा, ऐसे कपड़ा मत हटाओ"

मगर मा शायद पूरे जोश में आ चुकी थी,

"चल कोई नही देखता, फिर सामने बैठी हू, किसी को नज़र नही आएगा, देखु तो सही मेरे बेटे का गन्ना आख़िर है कितना बड़ा "?

और मेरा लंड देखता ही, आश्चर्य से उसका मुँह खुला का खुला रह गया, एकदम से चौंकती हुई बोली, "हाय दैया, ये क्या इतना मोटा, और इतना लंबा , ये कैसे हो गया रे, तेरे बाप का तो बीतते भर का भी नही है, और यहा तू बेलन के जैसा ले के घूम रहा है. "

"ओह, मा, मेरी इसमे क्या ग़लती है, ये तो शुरू में पहले छोटा सा था पर अब अचानक इतना बड़ा हो गया है तो मैं क्या करू"?

"ग़लती तो तेरी ही है जो तूने , इतना बड़ा जुगाड़ होते हुए भी अभी तक मुझे पता नही चलने दिया, वैसे जब मैने देखा था नहाते वक़्त तब तो इतना बड़ा नही दिख रहा था रे"

" मा, वो वो " मैं हकलाते हुए बोला "वो इसलिए कोयोंकि उस समय ये उतना खडा नही रहा होगा, अभी ये पूरा खडा हो गया है"

"ओह ओह तो अभी क्यों खडा कर लिया इतना बड़ा , कैसे खडा हो गया अभी तेरा?"

अब मैं क्या बोलता की कैसे खडा हो गया. ये तो बोल नही सकता था की मा तेरे कारण खडा हो गया है मेरा.

मैने सकपकते हुए कहा "अर्रे वो ऐसे ही खडा हो गया है तुम छोडो अभी ठीक हो जाएगा"

"ऐसे कैसे खडा हो जाता है तेरा" मा ने पुछा और मेरी आँखो में देख कर अपने रसीले होंठो का एक कोना दबा के मुस्कने लगी .

"अरे तुमने पकड़ रखा है ना इसलिए खड़ा हो गया है मेरा क्या करू मैं, छोड़ दो ना " मैने किसी भी तरह से मा का हाथ अपने लंड पर से हटा देना चाहता था. मुझे ऐसा लग रहा था की मा के कोमल हाथो का स्पर्श पा के कही मेरा पानी निकाल ना जाए. फिर मा ने केवल पकड़ा तो हुआ नही था. वो धीरे धीरे मेरे लंड को सहला भी और बार बार अपने अंगूठे से मेरे चिकने सुपाडे के छू भी रही थी.

" अच्छा अब सारा दोष मेरा हो गया, और खुद जो इतनी देर से मेरी छातियों पकड़ के मसल रहा था और दबा रहा था उसका कुछ नही"

" ग़लती हो गई"

"चल मान लिया ग़लती हो गई, पर सज़ा तो इसकी तुझे देनी परेगी, मेरा तूने मसला है, मैं भी तेरा मसल देती हू," कह कर मा अपने हाथो को थोडा तेज चलाने लगी और मेरे लंड का मूठ मारते हुए मेरे लंड के मुंडी को अंगूठे से थोरी तेज़ी के साथ घिसने लगी. मेरी हालत एकदम खराब हो रही थी. गुदगुदाहट और सनसनी के मारे मेरे मुँह से कोई आवाज़ नही निकाल पा रहा था ऐसा लग रहा था जैसे की मेरा पानी अब निकला की तब निकला. पर मा को मैं रोक भी नही पा रहा था.

मैने सिसकते हुए कहा "ओह मा, निकल जाएगा, मेरा निकल जाएगा"

इस पर मा ने और ज़ोर से हाथ चलते हुए अपनी नज़र उपर करके मेरी तरफ देखते हुए बोली "क्या निकल जाएगा?".

"ओह ओह, छोडो ना तुम जानती हो क्या निकाल जाएगा क्यों परेशान कर रही हो"

"मैं कहाँ परेशान कर रही हू, तू खुद परेशान हो रहा है"

"क्यों, मैं क्यों भला खुद को परेशान करूँगा, तुम तो खुद ही ज़बरदस्ती, पता नही क्यों मेरा लंड मसले जा रही हो"

"अच्छा, ज़रा ये तो बता शुरुआत किसने की थी मसल्ने की" कह कर मा मुस्कुराने लगी.

मुझे तो जैसे साँप सूंघ गया था मैं भला क्या जवाब देता कुछ समझ में ही नही आ रहा था की क्या करू क्या ना करू, उपर से मज़ा इतना आ रहा था की जान निकली जा रही थी. तभी वो हल्का सा आगे की ओर सरकी और झुकी, आगे झुकते ही उनका आँचल उनके ब्लाउज पर से सरक गया. पर उन्होने कोई प्रयास ऩही किया उसको ठीक करने का. अब तो मेरी हालत और खराब हो रही थी. मेरी आँखो के सामने उनकी नारियल के जैसी सख़्त चुचिया जिनको सपने में देख कर मैने ना जाने कितनी बार अपना माल गिराया था और जिनको दूर से देख कर ही तड़पता रहता था नुमाया थी. भले ही चूचियां अभी भी ब्लाउज में ही क़ैद थी परंतु उनके भारीपन और सख्ती का अंदाज उनके उपर से ही लगाया जा सकता था. ब्लाउज के उपरी भाग से उनकी चुचियों के बीच की खाई का उपरी गोरा गोरा हिस्सा नज़र आ रहा था. हलकी चुचियों को बहुत बड़ा तो ऩही कहा जा सकता पर, उतनी बड़ी तो थी ही जितनी एक स्वस्थ शरीर की मालकिन का हो सकता है . मेरा मतलब है की इतनी बड़ी जितनी की आप के हाथो में ना आए पर इतनी बड़ी भी ऩही की आप को दो दो हाथो से पकड़ना पड़े और फिर भी आपके हाथ ना आए. एकदम किसी भाले की तरह नुकीली लग रही थी और सामने की ओर निकली हुई थी. मेरी आँखे तो हटाए ऩही हट रही थी. तभी मा ने अपने हाथो को मेरे लंड पर थोरा ज़ोर से दबाते हुए पुछा "बोल ना दबाउ क्या और"

" मा छोडो ना"

उन्होने ने ज़ोर से मेरे लंड को मुट्ठी में भर लिया,

" मा छोडो ना बहुत गुदगुदी होती है "

"तो होने दे ना, तू खाली बोल दबाऊं या ऩही"

" दबाओ, मा मस्लो"

"अब आया ना रास्ते पर"

" मा तुम्हारे हाथो में तो जादू है "

"जादू हाथो में है या फिर इसमे है (अपने ब्लाउज की तरफ इशारा कर के पुछा)

" मा तुम तो बस"

"शरमाता क्यों हाई, बोल ना क्या अच्छा लग रहा है "

"माँ मैं क्या बोलू"

"क्यों क्या अच्छा लग रहा है ?", "अर्रे अब बोल भी दे शरमाता क्यों है "

"माँ अच्छा लग रहा है "

"तो फिर शर्मा क्यों रहा था बोलने में, फिर मा ने बड़े आराम से मेरे पूरे लंड को मुट्ठी के अंदर क़ैद कर हल्के हल्के अपना हाथ चलना शुरू कर दिया.

"तू तो पूरा जवान हो गया है रे"

"हाँ मा"

" पूरा सांड की तरह से जवान हो गया है तू तो, अब तो बर्दाश्त भी ऩही होता होगा, कैसे करता है"

"क्या मा"

"वही, बर्दाश्त, और क्या, तुझे तो अब छेद चाहिए, समझा?

छेद मतलब "? मा, ऩही समझा"

"क्या उल्लू लड़का है रे तू, छेद मतलब ऩही सकझता"

मैने नाटक करते हुए कहा "ऩही मा ऩही समझता".

इस पर मा हल्के हल्के मुस्कुराने लगी और बोली "चल समझ जाएगा, फिर उसने अपने हाथो को तेज़ी से मेरे लंड पर चलाने लगी. मारे गुदगुदी और सनसनी के मेरा तो बुरा हाल हो रखा था. समझ में ऩही आ रहा था क्या करू, दिल कर रहा था की हाथ को आगे बढ़ा कर मा के दोनो चुचियों को कस के पकड़ लूँ और खूब ज़ोर ज़ोर से दबाऊं . लेकिन डर रहा था की कही बुरा ना मान जाए. इसी चक्कर में मैने कराहते हुए सहारा लेने के लिए सामने बैठी मा के कंधे पर अपने दोनो हाथ रख दिए. वो बोली तो कुछ ऩही पर अपनी नज़रे उपर कर के मेरी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए बोली "क्यों मज़ा आ रहा है की ऩही""

हाँ , मा मज़े की तो बस पूछो मत बहुत मज़ा आ रहा है" मैं बोला. इस पर मा ने अपने हाथ और तेज़ी से चलना शुरू कर दिया और बोली "साले हरामी कही का, मैं जब नहाती हू तब घूर घूर के मुझे देखता रहता है, मैं जब सो रही थी तो मेरे चुचे दबा रहा था और, और अभी मज़े से मूठ मरवा रहा है, कमीने तेरे को शरम ऩही
आती" मेरा तो होश ही उड़ गया ये मा क्या बोल रही थी. पर मैने देखा की उसका एक हाथ अब भी पहले की तरह मेरे लंड को सहलाए जा रहा था. तभी मा मेरे चेहरे के उड़े हुए रंग को देख कर हंसने लगी और हँसते हुए मेरे गाल पर एक थप्पड़ लगा दिया. मैने कभी भी इस से पहले मा को ना तो ऐसे बोलते देखा था ना ही इस तरह से व्यवहार करते हुए नही देखा था इसलिए मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था. पर उनके हसते हुए थप्पड़ लगाने पर तो मुझे और भी ज़यादा आशचर्य हुआ की आख़िर ये चाहती क्या है. और मैने बोला की "माफ़ कर दो मा अगर कोई ग़लती हो गई हो तो" . इस पर मा ने मेरे गालो को हल्के सहलाते हुए कहा की "ग़लती तो तू कर बैठा है बेटे अब, केवल ग़लती की सज़ा मिलेगी तुझे,"

मैने कहा "क्या ग़लती हो गई मेरे से मा"

सबसे बरी ग़लती तो ये है की तू खाली घूर घूर के देखता है बस, करता धरता तो कुछ है ऩही, खाली घूर घूर के कितने दिन देखता रहेगा" .

"क्या करू मा, मेरी तो कुचछ समझ में ऩही आ रहा"

"साले बेवकूफ़ की औलाद, अर्रे करने के लिए इतना कुछ है और तुझे समझ में ही ऩही आ रहा है",

"क्या मा बताओ ना, "

"देख अभी जैसे की तेरा मन कर रहा है की तू मेरे अनारो से खेले,
उन्हे दबाए, मगर तू ऩही वो काम ना कर के केवल मुझे घूरे जा रहा है, बोल तेरा मन कर रहा है की ऩही, बोल ना"

"हाँ , मा मन तो मेरे बहुत कर रहा है,

"तो फिर दबा ना, मैं जैसे तेरे औज़ार से खेल रही हू वैसे ही तू मेरे समान से खेल, दबा बेटा दबा, बस फिर क्या था मेरी तो बांछे खिल गई मैने दोनो हथेलियो में दोनो चुचो को थाम लिया और हल्के हल्के उन्हे दबाने लगा., मा बोली "शाबाश , ऐसे ही दबाने का. जितना दबाने का मन उतना दबा ले, कर ले मज़े".

मैं फिर पूरे जोश के साथ हल्के हाथो से उसके चुचियों को दबाने लगा. ऐसी मस्त मस्त चुचिया पहली बार किसी ऐसे के हाथ लग जाए जिसने पहले किसी चुचि को दबाना तो दूर छुआ तक ना हो तो बंदा तो जन्नत में पहुच ही जाएगा ना. मेरा भी वही हाल था, मैने हल्के हाथो से संभाल संभाल के चुचियों को दबाए जा रहा था. उधर मा के हाथ तेज़ी से मेरे लंड पर चल रहे थे, तभी मा जो अब तक काफ़ी उत्तेजित हो चुकी थी ने मेरे चेहरे की ओर देखते हुए कहा "क्यों मज़ा आ रहा है ना, ज़ोर से दबा मेरे चुचयों को बेटा तभी पूरा मज़ा मिलेगा, मसलता जा, देख अभी तेरा माल मैं कैसे निकलती हू".

मैने ज़ोर से चुचियों को दबाना शुरू कर दिया था, मेरा मन कर रहा था की मैं मा के ब्लाउज खोल के चुचियों को नंगा करके उनको देखते हुए दबाऊं , इसीलये मैने मा से पुछा " मा तेरा ब्लाउज खोल दू?"

इस पर वो मुस्कुराते हुए बोली "ऩही अभी रहने दे, मैं जानती हू की तेरा बहुत मन कर रहा होगा की तू मेरी नंगी चुचियों को देखे मगर, अभी रहने दे"

मैं बोला ठीक है मा, पर मुझे लग रहा हाई की मेरे औज़ार से माल निकालने वाला है ".

इस पर मा बोली "कोई बात ऩही बेटा निकालने दे, तुझे मज़ा आ रहा है ना?"

"हा मा मज़ा तो बहुत आ रहा है"

"अभी क्या मज़ा आया है बेटे अभी तो और आएगा, अभी तेरा माल निकाल ले फिर देख मैं तुझे कैसे जन्नत की सैर कराती हू" कह कर मा ने अपना हाथ और ज़यादा तेज़ी के साथ चलना शुरू कर दिया. मेरे पानी अब बस निकालने वाला ही था, मैने भी अपना हाथ अब तेज़ी के साथ मा के अनारो पर चलाना शुरू कर दिया था. मेरा दिल कर रहा था उन प्यारे प्यारे चुचियों को अपने मुँह में भर के चुसू, लेकिन वो अभी संभव ऩही था. मुझे केवल चुचियों को दबा दबा के ही संतोष करना था. ऐसा लग रहा था जैसे की मैं अभी सातवे आसमान पर उड़ रहा था, मैं भी खूब ज़ोर ज़ोर सिसकते हुए बोलने लगा "ओह मा, हा मा और ज़ोर से मस्लो, और ज़ोर से मूठ मारो, निकाल दो मेरा सारा पानी"

पर तभी मुझे ऐसा लगा जैसे की मा ने लंड पर अपनी पकर ढीली कर दी है. लंड को छोड़ कर मेरे आंडो को अपने हाथ से पकड़ के सहलाते हुए मा बोली "अब तुझे एक नया मज़ा चखती हू, ठहर जा" और फिर धीरे धीरे मेरे लंड पर झुकने लगी, लंड को एक हाथ से पकडे हुए वो पूरी तरह से मेरे लंड पर झुक गई और अपने होठों को खोल कर मेरे लंड को अपने मुँह में भर लिया. मेरे मुँह से एक आह निकल गई, मुझे विश्वास ऩही हो रहा था की वो ये क्या कर रही है.

मैं बोला "ओह मा ये क्या कर रही हो, है छोड़ ना बहुत गुदगुदी हो रही है"

मगर वो बोली "तो फिर मज़े ले इस गुदगुदी के, करने दे तुझे अच्छा लगेगा".

" मा क्या इसको मुँह में भी लिया जाता,"

"हा मुँह में भी लिया जाता है और दूसरी जगहो पर भी, अभी तू मुँह में डालने का मज़ा लूट" कह कर तेज़ी के साथ मेरे लंड को चूसने लगी, मेरी तो कुछ समझ में ऩही आ रहा था, गुदगुदी और सनसनी के कारण मैं मज़े के सातवे आसमान पर झूल रहा था. मा ने पहले मेरे लंड के सुपारे को अपने मुँह में भरा और धीरे धीरे चूसने लगी, और मेरी ओर बड़ी सेक्सी अंदाज़ में अपने नज़रो को उठा के बोली, "कैसा लाल लाल सुपारा है रे तेरा, एकदम पहरी आलू के जैसे, लगता है अभी फट जाएगा, इतना लाल लाल सुपरा कुंवारे लड़कों का ही होता है" फिर वो और कस कस के मेरे सुपारे को अपने होंठो में भर भर के चूसने लगी. नदी के किनारे, पेड़ की छावं में मुझे ऐसा मज़ा मिल रहा था जिसकी मैने आज तक कल्पना तक ऩही की थी. मा अब मेरे आधे से अधिक लौरे को अपने मुँह में भर चुकी थी और अपने होंठो को कस के मेरे लंड के चारो तरफ से दबाये हुए धीरे धीरे उपर सुपारे तक लाती थी और फिर उसी तरह से सरकते हुए नीचे की तरफ ले जाती थी. उसकी शायद इस बात का अच्छी तरह से अहसास था की ये मेरा किसी औरत के साथ पहला संबंध है और मैने आज तक किसी औरत हाथो का स्पर्श अपने लंड पर ऩही महसूस किया है और इसी बात को ध्यान में रखते हुए वो मेरे लंड को बीच बीच में ढीला भी छोड़ देती थी और मेरे अंडों को दबाने लगती थी. वो इस बात का पूरा ध्यान रखे हुए थी की मैं जल्दी ना झाडूं . मुझे भी गजब का मज़ा आ रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे की मेरा लंड फट जाएगा मगर. मुझसे अब रहा ऩही जा रहा था मैने मा से कहा " मा, अब निकाल जाएगा मा, मेरा माल अब लगता है ऩही रुकेगा".

उसने मेरी बातो की ओर कोई ध्यान ऩही दिया और अपनी चूसाई जारी रखी.

मैने कहा "मा तेरे मुँह में ही निकल जाएगा, जल्दी से अपना मुँह हटा लो"

इस पर मा ने अपना मुँह थोरी देर के लिए हटाते हुए कहा की "कोई बात ऩही मेरे मुँह में ही निकाल मैं देखना चाहती हू की कुंवारे लड़के के पानी का स्वाद कैसा होता है" और फिर अपने मुँह में मेरे लंड को कस के जकड़ते हुए उसने अब अपना पूरा ध्यान केवल अब मेरे सुपाडे पर लगा दिया और मेरे सुपारे को कस कस के चूसने लगी, उसकी जीभ मेरे सुपारे के कटाव पर बार बार फिर रही थी. मैं सिसकते हुए बोलने लगा "ओह मा पी जाओ तो फिर, चख लो मेरे लंड का सारा पानी, ले लो अपने मुँह में, ओह ले लो, कितना मज़ा आ रहा है, ही मुझे ऩही पाता था की इतना मज़ा आता है, ही निकाल गया, निकाल गया, मा-निकला .

तभी मेरे लंड का फ़ौवारा छुट पड़ा और. तेज़ी के साथ भालभाला कर मेरे लंड से पानी गिरने लगा. मेरे लंड का सारा सारा पानी सीधे मा के मुँह में गिरता जा रहा था. और वो मज़े से मेरे लंड को चूसे जा रही थी. कुछ ही देर तक लगातार वो मेरे लंड को चुस्ती रही, मेरा लंड अब पूरी तरह से उसके थूक से भीग कर गीला हो गया था और धीरे धीरे सिकुड़ रहा था. पर उसने अब भी मेरे लंड को अपने मुँह से ऩही निकाला था और धीरे धीरे मेरे सिकुड़े हुए लंड को अपने मुँह में किसी चॉक्लेट की तरह घुमा रही थी. कुछ देर तक ऐसा ही करने के बाद जब मेरी साँसे भी कुछ शांत हो गई तब मा ने अपना चेहरा मेरे लंड पर से उठा लिया और अपने मुँह में जमा मेरे वीर्या को अपना मुँह खोल कर दिखाया और हल्के से हंस दी. फिर उसने मेरा सारा पानी गटक लिया और अपने सारी पल्लू से अपने होंठो को पोछती हुई बोली, " मज़ा आ गया, सच में कुंवारे लंड का पानी बड़ा मीठा होता है, मुझे ऩही पाता था की तेरा पानी इतना मजेदार होगा" फिर मेरे से पुछा "मज़ा आया की ऩही", मैं क्या जवाब देता, जोश ठंडा हो जाने के बाद मैने अपने सिर को नीचे झूका लिया था, पर गुदगुदी और सनसनी तो अब भी कायम थी, तभी मा ने मेरे लटके हुए लौरे को अपने हाथो में पकड़ा और धीरे से अपने साड़ी के पल्लू से पोछती हुई पूछी "बोल ना, मज़ा आया की ऩही," मैने शर्माते हुए जवाब दिया "हाँ मा बहुत मज़ा आया, इतना मज़ा कभी ऩही आया था",
तब मा ने पुछा "क्यों? अपने हाथ से नही करता था क्या",
"करता हूँ मा, पर उतना मज़ा ऩही आता था जितना आज आया है"
"औरत के हाथ से करवाने पर तो ज़यादा मज़ा आएगा ही, पर इस बात का ध्यान रखियो की किसी को पता ना चले "
"हा मा किसी को पता ऩही चलेगा"
तब मा उठ कर खडी हो गई, अपने साड़ी के पल्लू को और मेरे द्वारा मसले गये ब्लाउज को ठीक किया और मेरी ओर देख कर मुस्कुराते हुए अपने बुर के सामने अपने साड़ी को हल्के से दबाया और साड़ी को चूत के उपर ऐसे रगडा जैसे की पानी पोछ रही हो. मैं उसकी इस क्रिया को बरे गौर से देख रहा था. मेरे ध्यान से देखने पर वो हसते हुए बोली "मैं ज़रा पेशाब कर के आती हू, तुझे भी अगर करना है तो चल अब तो कोई शरम ऩही है" मैं हल्के से शरमाते हुए मुस्कुरा दिया तो बोली "क्यों अब भी शर्मा रहा है क्या". मैने इस पर कुछ ऩही कहा और चुप चाप उठ कर खडा हो गया. वो आगे चल दी और मैं उसके पीछे पीछे चल दिया. जब हम झाड़ियों के पास पहुच गये तो मा ने एक बार पीछे मुड कर मेरी ओर देखा और मुस्कुरई फिर झाड़ियों के पीछे पहुच कर बिना कुछ बोले अपने साड़ी उठा के पेशाब करने बैठ गई. उसकी दोनो गोरी गोरी जंघे उपर तक नंगी हो चुकी थी और उसने शायद अपने साड़ी को जान बुझ कर पीछे से उपर उठा दिया था जिस के कारण उसके दोनो चूतर भी नुमाया हो रहे थे. ये सीन देख कर मेरा लंड फिर से फुफ्करने लगा. उसका गोरे गोरे चूतर बड़े कमाल के लग रहे थे. मा ने अपने चूतडों को थोरा सा उचकाया हुआ था जिस के कारण उसके गांड की खाई भी दिख रही थी. हल्के भूरे रंग की गांड की खाई देख कर दिल तो यही कर रहा था की पास जा उस गांड की खाई में धीरे धीरे उंगली चलाऊं और गांड की भूरे रंग की छेद को अपनी उंगली से छेड़ूँ और देखूं की कैसे पाक-पकती है. तभी मा पेशाब कर के उठ खडी हुई और मेरी तरफ घूम गई. उसने अभी तक साड़ी को अपने जाँघों तक उठा रखा था. मेरी ओर देख कर मुस्कुराते हुए उसने अपने साड़ी को छोड़ दिया और नीचे गिरने दिया, फिर एक हाथ को अपनी चूत पर साड़ी के उपर से ले जा के रगड़ने लगी जैसे की पेशाब पोछ रही हो और बोली "चल तू भी पेशाब कर ले . खडा खडा मुँह क्या टाक रहा है".
मैं जो की अभी तक इस शानदार नज़ारे में खोया हुआ था थोडा सा चौंक गया पर फिर और हकलाते हुए बोला "हा हा अभी करता हू,,,,,, मैने सोचा पहले तुम कर लो इसलिए रुका था". फिर मैने अपने पाजामा के नाड़े को खोला और सीधा खड़े खड़े ही मूतने की कोशिश करने लगा. मेरा लंड तो फिर से खड़ा हो चुका था और खड़े लंड से पेशाब ही ऩही निकाल रहा था. मैने अपनी गांड तक का ज़ोर लगा दिया पेशाब करने के चक्कर में.
मा वही बगल में खडी हो कर मुझे देखे जा रही थी. मेरे खरे लंड को देख कर वो हसते हुए बोली "चल जल्दी से कर ले पेशाब, देर हो रही है घर भी जाना है" मैं क्या बोलता पेशाब तो निकाल ऩही रहा था. तभी मा ने आगे बढ़ कर मेरे लंड को अपने हाथो में पकड़ लिया और बोली "फिर से खाद कर लिया, अब पेशाब कैसे उतरेगा' ? कह कर लंड को हल्के हल्के सहलाने लगी, अब तो लंड और टाइट हो गया पर मेरे ज़ोर लगाने पर पेशाब की एक आध बूंदे नीचे गिर गई,
मैने मा से कहा "अर्रे तुम छोडो ना इसको, तुमहरे पकड़ने से तो ये और खड़ा हो जाएगा, छोडो "
और मा का हाथ अपने लंड पर से झटकने की कोशिश करने लगा, इस पर मा ने हसते हुए कहा "मैं तो छोड़ देती हू पर पहले ये तो बता की खडा क्यों किया था, अभी दो मिनिट पहले ही तो तेरा पानी निकाला था मैने, और तूने फिर से खडा कर लिया, कमाल का लड़का है तू तो". मैं कुछ ऩही बोला, अब लंड थोडा ढीला पड़ गया था और मैने पेशाब कर लिया. मूतने के बाद जल्दी से पाजामा के नाड़े को बाँध कर मैं मा के साथ झारियों के पीछे से निकल आया, मा के चेहरे पर अब भी मंद मंद मुस्कान आ रही थी. मैं जल्दी जल्दी चलते हुए आगे बढ़ा और कपडे के गट्ठर को उठा कर अपने माथे पर रख लिया, मा ने भी एक गट्ठर को उठा लिया और अब हम दोनो मा बेटे जल्दी जल्दी गाँव के पगडंडी वाले रास्ते पर चलने लगे.
शाम होते होते तक हम अपने घर पहुच चुके थे. कपड़ों के गट्ठर को इस्त्री करने वाले कमरे में रखने के बाद हमने हाथ मुँह धोया और फिर मा ने कहा कि बेटा चल कुछ खा पी ले. भूख तो वैसे मुझे नहीं लगी ऩही थी (दिमाग़ में जब सेक्स का भूत सवार हो तो भूख तो वैसे भी मार जाती हाई) पर फिर भी मैने अपना सिर सहमति में हिला दिया. मा ने अब तक अपने कपड़ों को बदल लिया था, मैने भी अपने पाजामा को खोल कर उसकी जगह पर लूँगी पहन ली क्यों की गर्मी के दिनों में लूँगी ज्यादा आरामदायक होती है . मा रसोई घर में चली गई.
रात के 9:30 ही बजे थे. पर गाँव में तो ऐसे भी लोग जल्दी ही सो जाया करते है. हम दोनो मा बेटे आ के बिछावन पर लेट गये. बिछावन पर मेरे पास ही मा भी आ के लेट गई थी. मा के इतने पास लेटने भर से मेरे शरीर में एक गुदगुदी सी दौड़ गई. उसके बदन से उठने वाली खुशबु मेरी सांसो में भरने लगी और मैं बेकाबू होने लगा था. मेरा लंड धीरे धीरे अपना सिर उठाने लगा था. तभी मा मेरी ओर करवट कर के घूमी और पुछा "बहुत तक गये हो ना"?
"हाँ , माँ , जिस दिन नदी पर जाना होता है, उस दिन तो थकावट ज्यादा हो ही जाती है"
"हाँ , मुझे भी बड़ी थकावट लग रही है, जैसे पूरा बदन टूट रहा हो"
"मैं दबा दूँ , थोड़ी थकान दूर हो जाएगी"
"ऩही रे, रहने दे तू, तू भी तो थक गया होगा"
"ऩही माँ उतना तो ऩही थका की तेरी सेवा ना कर सकु"
माँ के चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई और वो हँसते हुए बोली..."दिन में इतना कुछ हुआ था, उससे तो तेरी थकान और बढ़ गई होगी"
"नही दिन में थकान बढ़ने वाला तो कुछ ऩही हुआ था".

इस पर माँ थोड़ा सा और मेरे पास सरक कर आई, माँ के सरकने पर मैं भी थोड़ा सा उसकी तरफ सरका. हम दोनो की साँसे अब आपस में टकराने लगी थी. माँ ने अपने हाथो को हल्के से मेरी कमर पर रखा और धीरे धीरे अपने हाथो से मेरी कमर और जाँघो को सहलाने लगी. माँ की इस हरकत पर मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई और लंड अब फुफ्करने लगा था. माँ ने हल्के से मेरी जाँघो को दबाया. मैने हिम्मत कर के हल्के से अपने हाथो को बढ़ा के माँ की कमर पर रख दिया. वो कुछ ऩही बोली बस हल्का सा मुस्कुरा दी. मेरी हिम्मत बढ़ गई और मैं अपने हाथो से माँ के नंगे कमर को सहलाने लगा. माँ ने केवल पेटिकोट और ब्लाउज पहन रखा था. उसके ब्लाउज के उपर के दो बटन खुले हुए थे. इतने पास से उसकी चुचियों की गहरी घाटी नज़र आ रही थी और मन कर रहा था जल्दी से जल्दी उन चुचियों को पकड़ लूँ . पर किसी तरह से अपने आप को रोक रखा था. माँ ने जब मुझे चुचियों को घूरते हुए देखा तो मुस्कुराते हुए बोली, "क्या इरादा है तेरा, शाम से ही घूरे जा रहा है, खा जाएगा क्या मेरी चूची को ? "
"नही ,माँ तुम भी क्या बात कर रही हो, मैं कहा घूर रहा था? "
"चल झूठे , मुझे क्या पता ऩही चलता, रात में भी वही करेगा क्या"
"क्या माँ ?"
"वही जब मैं सो जाउंगी तो अपना लंड भी मसलेगा और मेरी चुचियों को भी दबाएगा."
"नहीं , माँ "
"तुझे देख के तो यही लग रहा है कि तू फिर से वही हरकत करने वाला है"
"ऩही, मा" .
मेरे हाथ अब माँ की नंगी जाँघो को सहला रहे थे.
"वैसे दिन में मज़ा आया था? " पुछ कर माँ ने हल्के से अपने हाथो को मेरे लूँगी के उपर लंड पर रख दिया.
मैने कहा "हाँ मा, बहुत अच्छा लगा था"
"फिर करने का मन कर रहा है क्या"
"हाँ , माँ "
 

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